उ.प्र. राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति में बंटवारे के आसार

लखनऊ।
चंद पत्रकारों की सियासत यूपी के पत्रकारों के इकबाल को धूमिल कर रही है। उ.प्र.राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति और इसके विरोधी गुट की तेज होती कटुता संकेत दे रही हैं कि संवाददाता समिति का बंटवारा हो जाएगा। लखनऊ के वरिष्ठ और प्रतिष्ठित पत्रकार ज्ञानेंद्र शर्मा, अजय कुमार, प्रमोद गोस्वामी,वीरेंद्र सक्सेना, मसूद हसन, सुरेंद्र दुबे और किशोर निगम की तरफ से जारी संवाददाता समिति के चुनावी कार्यक्रम की घोषणा के बाद समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने इस चुनावी कार्यक्रम को फर्जी करार दिया है।
बताते चल़े कि यूपी के 95 फीसद वर्किंग (कलम चलाने वाले) जर्नलिस्ट इस राजनीति या किसी संगठन/यूनियन अथवा उ.प्र.राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति को गंभीरता से नहीं लेते। ना इसमें कोई दिलचस्पी लेते हैं और ना इनसे कोई उम्मीद रखते हैं। और ना किसी नेतृत्व को स्वीकार करते है।
लेकिन चुनावबाजी/नेतागीरी/सियासत/संगठनबाजी/यूनियनबाजी और संवाददाता समिति की सियासत में पत्रकारों की वो मैजारिटी भी बदनाम हो रही है जिनका पत्रकारों की राजनीतिक से कोई सरोकार नहीं।
चंद रिटायर वरिष्ठ पत्रकारों/उ.प्र.राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति के चंद पदाधिकारियों और करीब सौ डेढ़ सौ सियासी पत्रकारों की खीचातानी/विवाद/खेमेबाजी/ कड़वाहट और राजनीतिक द्वेष की खबरों की जुगलबंदी उत्तर प्रदेश के गैर सियासी संपूर्ण पत्रकार वर्ग को बदनाम कर रही है।
संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी जल्दबादी में चुनव नहीं चाहते। उनका कहना है कि क्योंकि एक हजार पत्रकारों की सहभागिता वाले इस चुनाव की लम्बी प्रक्रिया महत्वपूर्ण सरकारी प्रेमसेज़ पर होती है इसलिए कोविड की एहतियात के मद्देनजर सूचना निदेशालय से जुड़े अधिकारियों की अनुमति प्राप्त करने के बाद ही आहिस्ता-आहिस्ता चुनावी प्रक्रिया को अंजाम दिया जा सकता है। दूसरी तरफ कुछ वरिष्ठ पत्रकारों ने चुनाव संचालन कमेटी के सदस्य के रूप में आज उ.प्र.राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति के चुनावों की घोषणा कर दी है। जिसके बाद समिति के अध्यक्ष ने पत्र जारी कर इस घोषणा को फर्जी करार दिया है। पत्र इस प्रकार है-
कोई चुनाव नहीं, शासन की अनुमति मिलते ही बुलाई जाएगी आमसभा
प्रिय साथियों,
उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति आपके सहयोग से निर्वाचित प्रतिनिधि संस्था है। जैसा कि आपको जानकारी है कि समिति के चुनाव होने है पर कोविड प्रोटोकाल, प्रतिबंधों व प्रशासनिक बाध्यताओं के लागू होने के चलते हमें सरकारी भवन (एनेक्सी मीडिया सेंटर, लोकभवन व विधानभवन सभागार) के उपयोग की उचित अनुमति नहीं मिल पा रही है। इन सब दिक्कतों को दूर करने के लिए समिति के चार पदाधिकारियों की एक टीम लगातार सूचना विभाग के उच्च अधिकारियों से वार्ता कर हल निकालने के लिए प्रयासरत है।
इस बीच कतिपय लोगों ने चंद लोगों (जैसे कि उनके स्वंय के जारी दस्तावेज बताते हैं कि यह संख्या 50 के आसपास है) की एक बैठक को आमसभा का नाम देते हुए कथित चुनाव समिति बना दी। उक्त चुनाव समिति की ओर से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार ने हमारी निर्वाचित समिति को एक पत्र भेज कर आदेशात्मक लहजे में चुनाव को लेकर सवाल पूंछा जिसका समुचित उत्तर दिया जा चुका है।
हमारी जानकारी में आया है कि दिनांक 15 जनवरी को इन चंद लोगों ने कथित तौर पर चुनाव कार्यक्रम जारी करते हुए इसकी एक नोटिस मीडिया सेंटर एनेक्सी व लोकभवन में चस्पा कर दिया है।
इस संदर्भ में निर्वाचित समिति के पदाधिकारियों नें अपर मुख्य सचिव सूचना सहित अन्य उच्च अधिकारियों को सूचना देते हुए सरकारी भवन के उपयोग के संदर्भ में अनुमति के विषय में जानकारी मांगी। सभी अधिकारियों ने इस तरह की किसी अनुमति देने व चुनाव जैसी कोई प्रक्रिया होने से इंकार किया है। सूचना विभाग के अधिकारियों ने किसी भी सरकारी भवन में इस तरह की गतिविधि के संचालन की अनुमति न देने की बात कही है।
हम आपको यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि मान्यता समिति का चुनाव आप सब की सहमति, सुझाव व निर्देशों के अनुसार बाकायदा आमसभा की बैठक बुलाकर कराए जाएंगे।
आपको यह भी बताना कि कथित तौर पर जारी किया गया चुनाव कार्यक्रम पूरी तरह से फर्जी व अवैधानिक है।
जल्दी ही सक्षम अधिकारियों की अनुमति उपरांत आमसभा की बैठक बुलाकर चुनाव की प्रक्रिया का निर्धारण व तिथियों की घोषणा की जाएगी।
सादर
हेमंत तिवारी
अध्यक्ष
उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति
सोशल मीडिया पर ऐसे चिट्ठी बम जारी हो रही हैं। विधानभवन और लोकभवन के प्रेस रूम और एनेक्सी के मीडिया सेंटर में गरमायी सियासी पत्रकारों की इस सियासत को लेकर सत्ता के गलियारों और नौकरशाहों में मजा लिया जा रहा है।
कहा ये जा रहे है कि पत्रकार आपस में लड़-मर रहे हैं। विभाजन हो रहा है। बंटवारा और खेमेबाजी हो रही है।
जबकि ऐसी सियासत में कलम के सिपाही वर्किंग/पेशेवर पत्रकार शामिल हैं ही नहीं। और हैं भी तो दाल में नमक के बराबर।
मीडिया संस्थानों में नौकरी करने वाले या कलम को अपनी ताकत बनाने वाले पत्रकारों को ऐसी सियासत में पड़ने में ना कोई दिलचस्पी है। ना इतना वक्त है और ना ही इस सियासत में पड़ सकते हैं।
नवेद शिकोह।







