प्रदेश सरकार की नीतियों और जनसहभागिता से हरित गलियारे के रूप में उभरा चित्रकूट

उत्तर प्रदेश का चित्रकूट जनपद इन दिनों अपनी पुरानी और चुनौतीपूर्ण छवि को पीछे छोड़कर विकास और पर्यावरण संरक्षण के एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है। विंध्य पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में बसा यह ऐतिहासिक और धार्मिक क्षेत्र कभी दस्यु प्रभावित माना जाता था, लेकिन आज यह अपनी हरियाली और ‘हरित गलियारों’ के रूप में एक नई पहचान बना रहा है। भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा समय-समय पर जारी की जाने वाली ‘इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट’ के आंकड़े इस बात का साफ गवाह हैं कि चित्रकूट के वन क्षेत्र में पिछले कुछ सालों में लगातार और काफी अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। साल 2019, 2021 और 2023 के दौरान सामने आए सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इस पूरे इलाके में ग्रीन कवर यानी हरित क्षेत्र बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे प्रदेश सरकार की नीतियां, जिला प्रशासन की सक्रियता और स्थानीय लोगों का सहयोग है, जिन्होंने मिलकर इस पथरीले और ऊबड़-खाबड़ क्षेत्र को खुशहाली के रास्ते पर ला खड़ा किया है।
प्रदेश सरकार के दिशा-निर्देशों के तहत चित्रकूट में चलाए गए बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियानों ने इस सफलता की मजबूत नींव रखी है। इन अभियानों की सबसे खास बात यह रही है कि इनमें बाहरी या सजावटी पौधों के बजाय स्थानीय मिट्टी और पर्यावरण के अनुकूल स्वदेशी प्रजातियों को प्राथमिकता दी गई। बरगद, नीम, महुआ और पीपल जैसे पारंपरिक पौधों को बड़े पैमाने पर रोपा गया, जिससे न सिर्फ जंगलों का दायरा बढ़ा, बल्कि जैव विविधता को भी नया जीवन मिला। इसके साथ ही, बुंदेलखंड जैसे कम वर्षा और पथरीली जमीन वाले क्षेत्र में पौधों को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती थी। इसके समाधान के लिए जिला प्रशासन के स्तर पर जल और मृदा संरक्षण के विशेष प्रयास किए गए। पहाड़ों और ढलानों पर पानी को रोकने के लिए कंटूर और अन्य जल संरक्षण ढांचे बनाए गए, जिससे जमीन में नमी बनी रही। इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आम जनता की भागीदारी का नतीजा यह हुआ कि लगाए गए पौधों के जीवित रहने की दर में बहुत बड़ी वृद्धि देखी गई, जो अमूमन ऐसे कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में देखने को नहीं मिलती।
इस पूरे हरित अभियान के बीच चित्रकूट के रानीपुर टाइगर रिजर्व ने पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों के विकास के मामले में पूरे देश में एक नई मिसाल पेश की है। यह न केवल उत्तर प्रदेश का चौथा बल्कि पूरे देश का 53वां टाइगर रिजर्व है, जिसने बुंदेलखंड जैसे बेहद चुनौतीपूर्ण माने जाने वाले इलाके में पारिस्थितिक सुधार की एक अद्भुत कहानी लिखी है। पन्ना टाइगर रिजर्व के करीब होने की वजह से रानीपुर का यह क्षेत्र हमेशा से वन्यजीवों के लिए एक प्राकृतिक गलियारे के रूप में काम करता रहा है। अब इसे टाइगर रिजर्व घोषित किए जाने के बाद बाघों के लिए एक बेहद सुरक्षित और अनुकूल माहौल तैयार हो गया है, जिससे उनके आने-जाने के मार्ग बेहतर हुए हैं और उनकी संख्या के साथ-साथ आनुवंशिक विविधता में भी सुधार आ रहा है। वन्यजीवों के संरक्षण के लिए केवल सुरक्षा ही काफी नहीं होती, बल्कि उनके लिए भोजन पानी की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
इसी बात को ध्यान में रखते हुए रानीपुर टाइगर रिजर्व के भीतर शिकार आधार यानी शाकाहारी जीवों की संख्या बढ़ाने के लिए आधुनिक सॉफ्टवेयर रिलीज तकनीक का सहारा लिया गया। इसके जरिए हिरण और अन्य शाकाहारी जानवरों को इस क्षेत्र में सुरक्षित तरीके से बसाया गया और उनके लिए बड़े-बड़े घास के मैदान तैयार किए गए, ताकि उन्हें भोजन की कोई कमी न हो। इसके अलावा पानी की बारहमासी उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए रिजर्व के अंदर बड़ी संख्या में चेक डैम और छोटे-छोटे तालाबों का निर्माण कराया गया है। इस जल प्रबंधन से न केवल वन्यजीवों को सालभर पीने का पानी मिल रहा है, बल्कि आसपास की वनस्पतियों और पेड़-पौधों को भी नया जीवन मिला है, जिसने वहां के स्थानीय तापमान और पर्यावरण को पहले से काफी बेहतर बना दिया है।
सुरक्षा के मोर्चे पर भी जिला प्रशासन और वन विभाग ने आधुनिक तकनीकों का बेहतरीन इस्तेमाल किया है। आज रानीपुर टाइगर रिजर्व में शिकार की घटनाओं को पूरी तरह से रोकने के लिए एम-स्ट्राइप्स (ड.ैज्तप्च्म्ै) जैसी स्मार्ट पेट्रोलिंग प्रणाली और जगह-जगह हाई-टेक कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं। इन आधुनिक उपकरणों की मदद से वन्यजीवों और पूरे जंगल पर चौबीसों घंटे पैनी नजर रखी जा रही है, जिससे ‘शून्य शिकार’ के लक्ष्य को हासिल करने में बड़ी सफलता मिली है। यह सुरक्षा व्यवस्था सिर्फ जानवरों को ही नहीं बचा रही है, बल्कि इस पूरे क्षेत्र को पर्यटन के नक्शे पर भी तेजी से उभार रही है। ईको-टूरिज्म के बढ़ने से चित्रकूट के स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के तमाम नए रास्ते खुल गए हैं। आज क्षेत्र के युवा गाइड, वाहन चालक और होटल-रिसॉर्ट जैसे आतिथ्य सत्कार के कामों से जुड़कर अपनी कमाई कर रहे हैं, जिससे इस पिछड़े माने जाने वाले क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को एक नई मजबूती मिल रही है।








