अपराधियों पर भारी बरेली पुलिस की ‘साइलेंट’ रणनीति, सोशल पुलिसिंग का नया मॉडल

बरेली पुलिस की पहचान अपराधियों की धरपकड़ और मुकदमों से होती है, लेकिन बीते कुछ समय में बरेली पुलिस ने पारंपरिक पुलिसिंग से इतर एक ऐसी ‘साइलेंट और स्मार्ट रणनीति’ पर काम किया है, जिसकी चर्चा अब पुलिस महकमे के गलियारों में जोरों पर है। वरिष्ठ अधिकारियों के नेतृत्व में जनपद पुलिस ने न सिर्फ अपराधियों की कमर तोड़ी है, बल्कि सोशल पुलिसिंग के जरिए जनता के दिलों में अपनी एक अलग जगह बनाई है।

डिजिटल ‘ट्रैप’: बिना शोर-शराबे के नेस्तनाबूद हो रहे अपराधियों के नेटवर्क

इस बार बरेली पुलिस की सफलता के पीछे सबसे बड़ा हाथ उसकी हाईटेक और ‘लो-प्रोफाइल’ सर्विलांस विंग का है। किसी भी वारदात के बाद पुलिस का ट्रेडिशनल सर्विलांस तो काम करता ही है, लेकिन बरेली पुलिस ने ‘प्रेडिक्टिव पुलिसिंग’ (Predictive Policing) को अपनाया है। इसके तहत सोशल मीडिया और डिजिटल फुटप्रिंट्स के जरिए संभावित उपद्रवियों और अपराधियों की गतिविधियों को अपराध होने से पहले ही भांपकर उन्हें निष्क्रिय किया जा रहा है। यही वजह है कि पिछले कुछ महीनों में कई बड़ी घटनाएं होने से पहले ही टल गईं, जिसकी भनक आम जनता और मीडिया तक को नहीं लगी।

थाना नहीं, समाधान केंद्र’: खाकी का बदला मानवीय चेहरा

आमतौर पर थानों के माहौल को लेकर आम जनता में एक हिचक होती है, लेकिन बरेली के थानों में हाल ही में शुरू की गई ‘सॉफ्ट स्किल्स और कम्युनिटी काउंसलिंग’ ने इस धारणा को बदल दिया है। वरिष्ठ अधिकारियों की व्यक्तिगत रुचि के कारण अब थानों में पारिवारिक विवादों, जमीनी रंजिशों और आपसी मतभेदों को मुकदमों के जाल में फंसाने के बजाय काउंसलिंग के जरिए सुलझाया जा रहा है। पुलिस की इस पहल से सैकड़ों परिवार टूटने से बचे हैं और न्यायालयों पर भी मुकदमों का बोझ कम हुआ है।

नाइट विंग्स’: अंधेरे में जागती खाकी, व्यापारियों और महिलाओं का बढ़ता भरोसा

बरेली पुलिस ने हाल ही में अपने रात्रि गश्त (Night Patrolling) के पैटर्न में बड़ा बदलाव किया है। इसे केवल सड़कों पर हूटर बजाने तक सीमित न रखकर ‘डार्क स्पॉट्स’ (सुनसान और अंधेरे इलाके) पर केंद्रित किया गया है। देर रात काम से लौटने वाली कामकाजी महिलाओं और तड़के मंडियों में जाने वाले व्यापारियों के लिए पुलिस की यह ‘विजिबल पुलिसिंग’ सुरक्षा का सबसे बड़ा कवच बन चुकी है।

कप्तान की ‘ओपन डोर’ पॉलिसी और पारदर्शी कप्तानी

इस पूरे बदलाव की धुरी बरेली के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की ‘ओपन डोर पॉलिसी’ (Open Door Policy) बिना किसी सिफारिश या पैरवी के, कोई भी पीड़ित सीधे अधिकारियों से मिलकर अपनी बात रख सकता है। इसके साथ ही, ग्राउंड पर काम करने वाले सिपाहियों और दरोगाओं के कल्याण (Welfare) के लिए किए जा रहे प्रयासों ने पूरी फोर्स के मनोबल को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है।

बरेली पुलिस की यह नई कार्यशैली यह साबित करती है कि पुलिसिंग केवल डंडे के बल पर नहीं, बल्कि अनुशासन, आधुनिक तकनीक और मानवीय संवेदनाओं के संतुलन से चलती है। बिना किसी आत्मप्रशंसा के, शांति और सुरक्षा की नई इबारत लिखती बरेली पुलिस की यह ‘साइलेंट वर्किंग’ वाकई काबिले-तारीफ है।

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