सीबीगंज की जमीन पर बदलाव की इबारत लिखता एक गुमनाम नायक नाम, अशोक आहूजा

बरेली अखबार के पन्ने अक्सर राजनीतिक खींचतान और अपराध की खबरों से रंगे होते हैं। सुर्खियां बटोरने की इस होड़ से दूर, बरेली के सीबीगंज इलाके में एक ऐसा व्यक्ति भी है, जिसकी पहचान किसी पद या होर्डिंग से नहीं, बल्कि लोगों की दुआओं से होती है। हम बात कर रहे हैं स्थानीय समाजसेवी अशोक आहूजा की। सीबीगंज का शायद ही कोई ऐसा कोना हो, जहां संकट के समय इस शख्स ने अपनी मौजूदगी न दर्ज कराई हो, लेकिन मुख्यधारा के मीडिया की नजरों से यह निस्वार्थ सेवा अब तक ओझल ही रही है।दिखावे के दौर में ‘गुप्त दान’ और खामोश सेवाआज के दौर में जहां एक केला बांटने पर भी चार लोग तस्वीरें खिंचवाते हैं, वहीं अशोक आहूजा का सेवाभाव बिल्कुल उलट है।
सीबीगंज के स्थानीय निवासियों से बात करने पर पता चलता है कि आहूजा जी का मूल मंत्र ‘एक हाथ से दो तो दूसरे हाथ को पता न चले। कड़ाके की ठंड में आधी रात को रेलवे स्टेशन और झुग्गियों में जाकर जरूरतमंदों को कंबल ओढ़ाना हो, या गरीब बेटियों के विवाह में बिना शोर-शराबे के आर्थिक मदद पहुंचाना, उनकी सक्रियता हर जगह दिखती है।
शिक्षा और स्वास्थ्य पर विशेष फोकस
सीबीगंज के मध्यमवर्गीय और पिछड़े तबके के परिवारों के लिए अशोक आहूजा एक मसीहा की तरह काम कर रहे हैं।क्षेत्र के कई ऐसे मेधावी छात्र हैं, जो पैसों के अभाव में पढ़ाई छोड़ने वाले थे। आहूजा जी ने न सिर्फ उनकी स्कूल फीस का जिम्मा उठाया, बल्कि उनके लिए कॉपियां और किताबें भी उपलब्ध कराईं।
गंभीर बीमारियों से जूझ रहे उन मरीजों के लिए, जो निजी अस्पतालों का खर्च उठाने में असमर्थ हैं, अशोक आहूजा ने दवाइयों और इलाज की व्यवस्था कराकर कई जिंदगियां बचाई हैं।स्थानीय युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत आहूजा जी की इस खामोश क्रांति का असर अब सीबीगंज के युवाओं पर भी दिखने लगा है। क्षेत्र के युवा अब सोशल मीडिया पर समय गंवाने के बजाय उनके साथ जुड़कर पर्यावरण संरक्षण, पौधरोपण और स्वच्छता अभियानों में हाथ बंटा रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अशोक जी ने कभी किसी राजनीतिक लाभ के लिए काम नहीं किया, यही वजह है कि हर धर्म और वर्ग के लोग उनका दिल से सम्मान करते हैं।
एक पत्रकार का नजरिया
मीडिया की चकाचौंध से दूर रहने वाले अशोक आहूजा जैसे जमीनी समाजसेवी ही समाज का असली ढांचा तैयार करते हैं। सीबीगंज निवासी इस नायक की कहानी हमें यह सिखाती है कि बदलाव लाने के लिए किसी बड़े मंच या बजट की जरूरत नहीं होती, बस एक साफ नीयत और संवेदनशील दिल का होना ही काफी है।आज के इस चमक-दमक वाले दौर में, जहाँ हर तरफ ‘मैं’ और ‘मेरा’ का शोर है, अशोक आहूजा का वजूद एक ठंडी हवा के झोंके की तरह है। वे इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि समाज को बदलने के लिए ऊंचे पदों, राजनीतिक रसूख या भारी-भरकम बजट की ज़रूरत नहीं होती। समाज को बदलने के लिए सिर्फ एक संवेदनशील दिल की ज़रूरत होती है, जो दूसरे के सीने में उठने वाले दर्द को महसूस कर सके। सीबीगंज के इस ‘अनाम संत’ को हमारा सलाम, जिनकी खामोशी भी समाज में एक बड़ा बदलाव लिख रही है।