पूरे देश में एक्सप्रेस वे बनवाने की चल रही होड: दिनेश कुमार गर्ग

कहते हैं न कि विकास सड़क के रास्ते है और सड़क अगर साधारण न होकर एक्सप्रेस वे हो तो आने वाले विकास की रफ्तार भी एक्सप्रेस हो जाती है और इसीलिए पूरे देश में एक्सप्रेस वे बनवाने की होड चल रही है। हर राज्य एक्सप्रेस वे बनवाने के प्रयास में है। केन्द्र सरकार खुद दिल्ली-जयपुर-मुम्बई एक्सप्रेस वे पर निर्माण का तेजी से काम कर रही है। 1350 किमी लम्बे इस एक्सप्रेस वे को 2023 में पूरा करने का लक्ष्य भारत के एक्सप्रेस वे मैन नितिन गडकरी मंत्री भारत सरकार ने रखा है। हम सब जानते हैं कि नितिन गडकरी ने ही सबसे पहला एक्सप्रेस वे महाराष्ट्र के मंत्री के रूप में मुम्बई-पुने एक्सप्रेस वे परिकल्पित और निर्मित करायी थी तो नितिन गडकरी का शगल है बेहतरीन निर्बाध सडकों की कल्पना करना और उन्हे जमीन पर उतार देना। हमारे उत्तर प्रदेश का मेरठ दिल्ली एक्सप्रेस वे भी उन्ही के कमिटमेंट का नतीजा है कि बना और मेरठ से दिल्ली का घंटों का रास्ता मात्र 35 मिनट का हो गया है । तो भरोसा है कि गडकरी साहब दिल्ली मुम्बई को एक्सप्रेस वे से सन् 2023 में जोडने में सफल होंगे ।
पर आज यहां बात हो रही है उत्तर प्रदेश की जहां एक दिल्ली आगरा एक्सप्रेस वे का निर्माण बहन मायावती के समय में हुआ पर उद्घाटन अखिलेश यादव ने किया। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इन्फ्रास्ट्रक्चर पर बहुत जोर रखा और इसलिए लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे को लेकर आये। इससे फायदा ज्यादा न मिल सका सिवाय मोटरिस्ट्स के क्योंकि इसको बने हुए लगभग 5 साल हो गये एक भी बडी परियोजना 300 किमी लम्बे पिछडे क्षेत्र मे नही आयी । निजी पूंजी निवेशक इस क्षेत्र से दूर ही रही न जाने क्यों ?
उत्तर प्रदेश के सौभाग्य से 2017 के विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की उत्तरप्रदेश में भारी विजय हुई और सोने में सुहागा की तरह केन्द्रीय नेतृत्व ने सरकार का घठन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में किया। पूछ सकते हैं कि इसमें कौन सा सुहागा है ? कोई न कोई विधायक मुख्यमंत्री बनता ही। जी सही पर जैसा सब लोग जानते हैं कि 2016 में नोटबन्दी और फिर जीएसटी और फिर लगातार आर्थिक सुधार कर रहे प्रधानमंत्री मोदी एक सच्चे चौकीदार हैं जो किसी भी मौके पर चूकते नहीं और हर स्थिति को, प्रतिकूलता को भी अवसर में बदल देने के अद्भुत राजनेता और स्टेट्समैन है, वह उत्तरप्रदेश की जनता द्वारा इतनी भारी मेजोरिटी की सरकार का जो मैन्डेट मोदी जी को दिया उसे सेर की जगह सवा सेर बनाने का मौका क्यों चूकते। भारतीय जनता पार्टी का एक वर्ग किसी और का नाम चला रहा था , मोदी जी यानी भारत के चौकीदार जी तेल देखो तेल की धार देखो की मुद्रा में चुपचाप महत्वाकांक्षियों की उछलकूद देखते रहे और अचानक 18 मार्च को योगी जी को लखनऊ शपथ ग्रहण के लिए भेज दिया। लोग विस्मय से भर गये मोदी जी की तुरुप चाल से। मोदी जी के पत्ते होते ही ऐसे हैं कि पूरी दुनिया में कोई अन्दाज नहीं लगा पाता कि उनकी अगली चाल क्या होगी।
दर असल लोग वह नहीं समझ पाये जो मोदी जे योगी जी के बारे में समझा – जब वह संगठन में थे तब सब उभर रहे भाजपाई नेताओं की पूरी कुण्डली रखते थे। उन्हे मालुम रहा कि योगी आदित्यनाथ एक ऐतिहासिक मठ के महन्त भर नहीं , पांच बार के सांसद हैं , अन्य सांसदों की तरह सांसद निधि का दुरुपयोग नहीं करते, जनता के दुःख दर्द पर तत्कालीन सरकार की निष्ठुरता पर संसद में रो देने की हद तक संवेदनशील हैं, पूरी पृथ्वी का भाजपाई विश्व में हुए बदलाव व प्रगति से दो-चार हैं और मठ की आना-पाई के भी गुनहगार नहीं हैं। ऐसे ही हीरे पर उनकी नजर रही और मौका आया तो नाम आगे कर दिया, शपथग्रहण समारोह तक में आ गये – एक ऐसे योगी को उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य का शासन सौंपने जिसने कभी मंत्री के रूप में भी शासन चलाने का अनुभव हासिल नही किया रहा। पर क्या गजब का मोदी जी का फैसला रहा कि योगी ने मंच से शपथ का मैं कहा ,मंच के नीचे पुलिस का ऐक्शन शुरू हो गया बच्चियों और महिलाओं की इज्जत को इज्जत न समझने वाले लोफरों पर, बस्तियों के भीतर बिना अनुमति के संचालित कसाईखानों पर , माफियाओं और क्रिमिनलों पर। चंद घंटों में लोगों को फर्क साफ दिखने लगा। पर कहानी तो अभी शुरू हुई थी क्योंकि मोदी जी ने योगी जी का चयन भारत के मुस्तकबिल में सहयोग करने के लिए किया था। भारत का मुस्तकबिल यानी 5 ट्रिलियन की ईकोनामी बनाने का लक्ष्य जिसमें उत्तर प्रदेश का हिस्सा 1 ट्रिलियन डालर होना है यानी 1 लाख करोड डालर। भारतीय रु में 75.13 लाख करोड रुपये की अर्थव्यवस्था अकेले उत्तरप्रदेश की करने का लक्ष्य मोदी जी ने सेट किया। अभी हम 17.6 लाख करोड की अर्थव्यवस्था हैं । इस विशाल लक्ष्य को सम्मुख रख सहयोगी जी ने बिग इन्वेस्टमेंट, बिग इन्फ्रास्ट्रक्चर, व्यापक इण्डस्ट्रियलाइजेशन और क्वालिटी एजूकेशन पर दांव खेला है और उसी का परिणाम है कि प्रदेश के सभी कोनों में एक्सप्रेस वे बनवाने का आइडिया आया और काम शुरू हुआ।
341 किमी लम्बे पूर्वांचल एक्सप्रेस वे का काम शुरू हुआ एक ऐसे क्षेत्र में जो भारत की स्वतंत्रता के समय से पिछडा हुआ था – बाराबंकी, सुल्तानपुर, अमेठी,अम्बेडकर नगर,अयोध्या, आजमगढ,मऊ और गाजीपुर को विकास की तार से जोडना था। संकल्प से सिद्धि हासिल हुई और रिकार्ड समय में यह बनकर तैयार हो गया , कोरोना की बाधाओं के बाद भी। यह एक्सप्रेस वे न केवल सडक परिवहन के लिए उपलब्ध होगा, बल्कि सुल्तानपुर में वायुसेना के लडाकू विमानों के लिए 3.2 किमी की हवाई पट्टी भी उपलब्ध करायेगा। 22495 करोड रु खर्च हुए इसे बनाने में।
पूर्वांचल एक्सप्रेस वे का एक लिंक एक्सप्रेस वे भी बन रहा है जो गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे के नाम से है। यह गोरखपुर, अम्बेडकर नगर, संत कबीर नगर और आजमगढ को लाभान्वित करेगा । इसकी लम्बाई 91.352 किमी है और इस पर 5877 करोड रु की लागत आयेगी।
योगी जी का दूसरा एक्सप्रेस वे बन रहा है प्रदेश के अत्यंत पिछडे भाग बुन्देलखण्ड में। इसका नाम है बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस वे जो चित्रकूट,  बांदा, हमीरपुर,जालौन की सेवा में होगा। इसकी कुल लम्बाई 296 किमी होगी। चित्रकूट के भरतकूप से शुरू होकर यह लखनऊ आगरा एक्सप्रेस वे पर जनपद इटावा के कुदरैल नामक जगह पर मिलेगा।इसका तेजी से निर्माण हो रहा है इसकी लागत 14849 करोड रुपये है।
योगी जी का सबसे महत्वाकांक्षी एक्सप्रेस वे होगा गंगा एक्सप्रेस वे जो 594 किमी  लम्बा होगा और जिस पर 94प्रतिशत भूमि का क्रय किया जा चुका है। यह एक्सप्रेस वे मेरठ, हापुड, बुलन्दशहर, अमरोहा, सम्भल, बदायूं, शाहजहांपुर, हरदोई, उन्नाव रायबरेली,प्रताप गढ और प्रयागराज को विकास के एक्सप्रेस वे से जोडेगी।
उपरोक्त चारों एक्सप्रेस वे अधिकांशतः प्रगति की धारा से छूटे जनपदों को विकास से जोडने वाले हैं। यानी अब जो भी औद्योगिक  गतिविधि होगी ट्रांसपोर्ट की सुगमता के कारण इन्ही जनपदों में होगी। एक्सप्रेस वे के किनारे सब सुविधापूर्ण औद्योगिक क्लस्टर डेवेलपमेंट किये जायेंगे। सीधा मतलब कि रोजगार और पार्श्ववर्ती सोशियो-इकोनामिक गतिविधियों में भारी वृद्धि होने का आगणन है। बस अगला कदम पिछले कई तरह सही पड जाये बस !!!
लेखक: दिनेश कुमार गर्ग।

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