प्रतापगढ़ में बायोफ्लॉक तकनीक से नीली क्रांति को मिली रफ्तार, रणंजय सिंह बने स्वरोजगार की मिसाल

उत्तर प्रदेश में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने और ग्रामीण युवाओं को स्वरोजगार के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा मत्स्य पालन क्षेत्र को एक अग्रणी स्तंभ के रूप में विकसित किया जा रहा है। प्रदेश सरकार की दूरदर्शी नीतियों, आधुनिक तकनीकों के समावेशन और जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से राज्य का मत्स्य क्षेत्र नीली क्रांति की नई ऊंचाइयों को छू रहा है।

राज्य सरकार द्वारा मत्स्य विकास को विशेष प्राथमिकता देते हुए ‘प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना‘ एवं ‘मुख्यमंत्री मत्स्य संपदा योजना‘ का धरातल पर सफल संचालन किया जा रहा है। इन दूरगामी योजनाओं के माध्यम से न केवल राज्य में मछली उत्पादन में अभूतपूर्व और रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायी आजीविका और स्वरोजगार के नए-नए साधन भी निरंतर सृजित हो रहे हैं।

प्रदेश सरकार द्वारा संचालित योजनाओं का मुख्य ध्येय गांवों से होने वाले पलायन की समस्या पर प्रभावी अंकुश लगाना तथा ग्रामीण युवाओं को आत्मनिर्भर बनाकर रोजगार देने वाला बनाना है। मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए राज्य भर में चलाए जा रहे अभियानों और कार्यक्रमों ने ग्रामीण युवाओं को स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता का नया मार्ग दिखाया है। इसी क्रम में प्रदेश के विभिन्न जनपदों में चलाए जा रहे व्यापक जागरूकता कार्यक्रमों, पारदर्शी प्रक्रियाओं तथा ऑनलाइन आवेदन प्रणालियों से एक सुदृढ़ व्यवस्था स्थापित की गई है। इस व्यवस्था के माध्यम से जरूरतमंद, पात्र और इच्छुक युवाओं तक योजनाओं का सीधा और पारदर्शी लाभ पहुँच रहा है।

इसी क्रम में जनपद प्रतापगढ़ के विकास खंड सण्डवा चंद्रिका स्थित ग्राम कटका मानापुर के निवासी रणंजय सिंह ने मत्स्य पालन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता अर्जित कर क्षेत्र के अन्य युवाओं तथा किसानों के सामने एक उत्कृष्ट उदाहरण और प्रेरणा प्रस्तुत की है। पूर्व में पारंपरिक खेती-किसानी पर निर्भर रहने के कारण सीमित कृषि भूमि और निरंतर बढ़ती कृषि लागत के चलते उन्हें अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिल पा रहा था। पारंपरिक खेती से परिवार का भरण-पोषण तो हो जाता था, लेकिन आर्थिक प्रगति की गति अत्यंत धीमी थी। ऐसे समय में समाचार पत्रों, विभागीय प्रचार माध्यमों तथा विज्ञप्तियों के जरिए उन्हें मत्स्य पालन और विशेष रूप से बायोफ्लॉक तकनीक की विस्तृत जानकारी प्राप्त हुई।

जिला प्रशासन एवं संबंधित विभागीय योजनाओं के तकनीकी मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से प्रेरित होकर उन्होंने आधुनिक मत्स्य पालन को अपनाने का निश्चय किया। इसके उपरांत उन्होंने अपनी लगभग 0.10 हेक्टेयर निजी भूमि पर आधुनिक बायोफ्लॉक प्रणाली के तहत मत्स्य पालन इकाई की स्थापना का कार्य प्रारंभ किया। इस इकाई में पंगेशियस प्रजाति की मछलियों के पालन हेतु विभागीय स्वीकृति मिलने के उपरांत उन्होंने निजी बोरिंग, विद्युत संयोजन और सुरक्षित भंडारण जैसी आवश्यक बुनियादी सुविधाओं का विकास किया। कम पानी और सीमित भूमि में अधिक उत्पादन देने वाली यह पर्यावरण-अनुकूल प्रणाली उनके लिए अत्यंत लाभदायक और प्रभावकारी साबित हुई।

चरणबद्ध तरीके से मत्स्य बीज का संचयन, वैज्ञानिक जल प्रबंधन और आहार नियंत्रण अपनाते हुए उनकी इस इकाई से औसतन 1.40 टन प्रति वर्ष मछली का उत्पादन प्राप्त होने लगा। आर्थिक दृष्टि से भी यह पहल अत्यंत सफल और प्रेरणादायक सिद्ध हुई है। वर्तमान में उनकी इकाई पर लगभग 7 लाख रुपये की वार्षिक लागत आती है, जबकि उत्पादित मछली की बिक्री से प्रतिवर्ष लगभग 18 लाख रुपये तक की सकल आय अर्जित हो रही है। सभी आवश्यक संचालन व्ययों को घटाने के पश्चात उन्हें प्रतिवर्ष लगभग 6 लाख रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हो रही है, जो पारंपरिक खेती की तुलना में कई गुना अधिक है। इसके अतिरिक्त, इस परियोजना के माध्यम से स्थानीय स्तर पर लगभग 10 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार भी उपलब्ध हुआ है, जिससे ग्रामीण युवाओं को गांव में ही आजीविका मिल रही है।

उत्तर प्रदेश में पारंपरिक मत्स्य पालन से आगे बढ़ते हुए अब बायोफ्लॉक प्रणाली, रीसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम (आरएएस) और केज कल्चर जैसी अत्याधुनिक तकनीकों को व्यापक रूप से प्रोत्साहित किया जा रहा है। ये आधुनिक प्रणालियाँ कम लागत, सीमित जल और न्यूनतम भूमि में भी अधिकतम उत्पादन सुनिश्चित करती हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों के शिक्षित, प्रगतिशील और तकनीक-प्रेमी युवा इस व्यवसाय की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं और कृषि आधारित सहायक उद्यमों को एक नई दिशा दे रहे हैं।

ग्रामीण आत्मनिर्भरता और सामाजिक समरसता को विशेष गति देने के उद्देश्य से स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को भी मत्स्य पालन गतिविधियों, जैसे मत्स्य बीज उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन से बड़े पैमाने पर जोड़ा जा रहा है। इस पहल ने ग्रामीण महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके साथ ही, ग्राम सभाओं के तालाबों को पट्टे पर देने की पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से स्थानीय मछुआरा समुदायों, पारंपरिक मत्स्य पालकों और भूमिहीन परिवारों को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे उनकी आय में निरंतर और स्थायी वृद्धि हो रही है।

मत्स्य पालकों को आर्थिक सुरक्षा एवं जोखिम प्रबंधन प्रदान करने के उद्देश्य से बीमा कवरेज, किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) की सुविधा, उच्च गुणवत्ता वाले मत्स्य बीज और संतुलित आहार पर अनुदान निरंतर उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके साथ ही, जिला प्रशासन के सहयोग से आयोजित नियमित प्रशिक्षण सत्रों के माध्यम से मत्स्य पालकों को जल की गुणवत्ता, वैज्ञानिक रख-रखाव, बीमारी नियंत्रण और आहार प्रबंधन से संबंधित बारीकियों का व्यावहारिक ज्ञान प्रदान किया जा रहा है, ताकि जोखिम को न्यूनतम करके उत्पादकता और लाभ को अधिकतम किया जा सके।

उत्पादित मछली के उचित मूल्य प्रबंधन, गुणवत्ता संरक्षण और त्वरित विपणन के लिए प्रदेश भर में कोल्ड चेन, रेफ्रिजरेटेड वाहनों और आधुनिक मत्स्य बाजारों का मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार किया जा रहा है। इन समेकित प्रयासों से बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो रही है और उत्पादकों को उनकी उपज का सीधा और वाजिब मूल्य मिल पा रहा है। विपणन व्यवस्था के सुदृढ़ होने से ग्रामीण क्षेत्रों में एक नए व्यापारिक और व्यावसायिक तंत्र का निरंतर विकास हो रहा है।

प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार के एकीकृत प्रयासों से उत्तर प्रदेश आज अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादन के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में मजबूती से स्थापित हो चुका है। प्रतापगढ़ जनपद के रणंजय सिंह जैसे प्रगतिशील मत्स्य पालकों की सफलता यह सिद्ध करती है कि सही मार्गदर्शन के साथ सरकारी योजनाओं से जुड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में भी बड़े स्तर पर आर्थिक परिवर्तन लाया जा सकता है।

ऐसे प्रयास ग्रामीण क्षेत्रों से रोजगार की तलाश में पलायन को रोकने में भी कारगर हो रहे हैं। ग्रामीण विकास के क्षेत्र में हो रहे ये व्यापक और सकारात्मक परिवर्तन स्पष्ट रूप से प्रमाणित करते हैं कि कृषि एवं उसके सहायक व्यवसायों को आधुनिक तकनीक से जोड़कर ही समृद्ध और आत्मनिर्भर गांव की कल्पना को साकार किया जा सकता है।

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