मुख्यमंत्री योगी ने ‘अखिल भारतीय संस्थागत नेतृत्व समागम’ का उद्घाटन किया

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि भारत ने अपनी आजादी का अमृत महोत्सव हर्ष और उल्लास के साथ सम्पन्न कर अमृत काल में प्रवेश किया है। जब देश अपनी आजादी का शताब्दी महोत्सव मना रहा होगा, उस समय विकसित भारत के निर्माण के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से अपनी-अपनी भूमिका निभाने तथा अपना योगदान देने का आह्वान किया है।

मुख्यमंत्री ने लखनऊ विश्वविद्यालय में आयोजित ‘अखिल भारतीय संस्थागत नेतृत्व समागम’ का उद्घाटन करने के उपरान्त इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त किये। ज्ञातव्य है कि इस समागम का आयोजन विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान, लखनऊ विश्वविद्यालय तथा प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा किया गया है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि विकसित भारत का निर्माण केवल देश के नेतृत्व का ही कार्य नहीं है, यह सभी राज्यों, जनपदों, गांवों और व्यक्तियों तथा शिक्षण संस्थाओं का भी कार्य है। जो व्यक्ति जिस क्षेत्र में है, यदि वह अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन ईमानदारीपूर्वक करें, तो दुनिया की कोई ताकत प्रधानमंत्री के विजन के अनुरूप वर्ष 2047 में भारत को विकसित देश के रूप में स्थापित होने से नहीं रोक सकती है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि विकसित भारत की परिकल्पना केवल आर्थिक शक्ति के रूप में ही नहीं है, बल्कि उन सभी क्षेत्रों में है, जिसके लिए दुनिया आज भारत की ओर देखती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि अगले तीन वर्षों में भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। आज भारत का नेतृत्व जन विश्वास का प्रतीक बना है। भारत की सीमाएं सुरक्षित हुई हैं। दुनिया में भारत का गौरव पुनस्र्थापित हुआ है। प्रवासी भारतीय भी मानते हैं कि अब उन्हें दुनिया में सम्मान मिलता है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि अगर समाज का हर व्यक्ति अपने-अपने दायित्व का निर्वहन करने लगे तो यह संभव है। प्रधानमंत्री जी ने आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को प्राप्त करने तथा विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए सभी देशवासियों को पंचप्रण दिए हैं। यदि हम पंचप्रण की पांच बातों को अपने जीवन का हिस्सा बना लेंगे, तो देश के प्रति अपनी सेवाओं को देने में सफल हो पाएंगे।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि नेतृत्व बदलने से किस प्रकार लोगों के मन में एक विश्वास उत्पन्न होता है, यह वर्ष 2014 के पूर्व के भारत और वर्ष 2014 के बाद के भारत के अनुभव से देखा जा सकता है। वर्ष 2014 के पूर्व, भारत के सामान्य जन में अविश्वास था तथा उनमें असमंजस की स्थिति थी। देश की सीमाएं असुरक्षित थीं। किसी भी क्षेत्र में कोई दिशा नहीं थी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि आज का यह समागम शिक्षण संस्थानों से जुड़ा है। कभी दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान भारत के हुआ करते थे। दुनिया का कोई ऐसा देश, कोई ऐसा मत, मजहब या सम्प्रदाय नहीं है, जिसका 05 हजार या 12 हजार वर्षाें का गौरवशाली इतिहास हो। विगत 22 जनवरी को प्रधानमंत्री जी के कर कमलों से अयोध्या में प्रभु श्रीरामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह को देश और दुनिया ने देखा है। त्रेता युग आज से हजारों वर्ष पुरानी परम्परा है। भगवान श्रीराम त्रेता युग के अंत में हुए थे। इससे पहले भी युग थे। अब तक ऐसे अनेक युग बीत चुके हैं। हम उस परम्परा के वाहक हैं। हमारे पास हमारे पूर्वजों, हमारी श्रवण परम्परा, हमारी वैदिक परम्परा, वैदिक ग्रंथों, शास्त्रों, स्मृतियों और पुराणों के माध्यम से हमारा इतिहास मौजूद है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने अपनी उस परम्परा को आगे बढ़ाने का कार्य रोक सा दिया था। अपने ज्ञान पर गौरव की अनुभूति करने के बजाए, हमने उसे हेय दृष्टि से देखा। दूसरों के ज्ञान को महत्व देना प्रारम्भ किया। गुलामी की मानसिकता हमारे मन में भर गयी और हमने भारतीयता को महत्व देना ही बन्द कर दिया था। आज हमारे पास भारत के गौरव को पुनस्र्थापित करने का पुनः एक अवसर है। इसके लिए शिक्षण संस्थानों को अपनी भूमिका के साथ आगे बढ़ना होगा। व्यक्तियों, समाज तथा देश के निर्माण के लिए सभी स्तर के संस्थानों की जिम्मेदारी है। हमें इसके बारे में सोचना होगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि शिक्षण संस्थान स्वयं को केवल डिग्री, डिप्लोमा या सर्टिफिकेट वितरण तक ही सीमित न रखें, बल्कि अपने कार्याें में नयापन लाएं। सभी शिक्षण संस्थान नये चिन्तन, नवाचार के नये तरीकों तथा शोध व विकास की नयी परम्परा को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दें। सरकार के कार्यक्रम लोकहित के लिए होते हैं। हमारे संस्थानों को इनसे जुड़ना चाहिए और युवाओं को इसकी जानकारी देनी चाहिए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि हम विद्यार्थियों को शिक्षित तो बना रहे हैं, लेकिन जब वह शिक्षण संस्थानों से बाहर निकलते हैं, तो उनके पास ज्ञान नहीं होता। उसे अपने उद्देश्य की खोज के लिए भटकना पड़ता है। यह समागम इस भटकाव को दूर करने का एक माध्यम तथा मंथन का कार्यक्रम है। छात्र-छात्राओं के चरित्र का निर्माण तथा उनके सर्वांगीण विकास के लिए यह मंथन होना चाहिए। विद्यार्थियों को शिक्षित भी बनाना है और उन्हें ज्ञानवान भी बनाना है। जब वह व्यावहारिक ज्ञान से परिपूर्ण होकर शिक्षण संस्थानों से बाहर निकलें, तो वह आत्मविश्वास से भरपूर हो। जीवन के जिस क्षेत्र की जिम्मेदारी उसे दी जाए, उसे वह पूरे आत्मविश्वास के साथ चुनौती के रूप में स्वीकार करे और अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सफल हो।

मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारे सभी उच्च शिक्षण संस्थान जैसे-आई0आई0टी0, एन0आई0टी0, आई0आई0एम0, केन्द्रीय तथा राज्य विश्वविद्यालय एवं अन्य संस्थान जिन्होंने अपने स्तर पर कुछ अच्छा किया है, लेकिन उनके कार्य उन्हीं तक सीमित हैं, ऐसे संस्थानों को अपने विद्यार्थियों को शिक्षित और ज्ञानवान बनाने के कार्याें से जुड़ना चाहिए। भारतीय मनीषा कहती है कि ‘आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वत’ अर्थात ज्ञान को आने के लिए सभी दिशाओं से रास्ते खुले रखने चाहिए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि नैमिषारण्य में 88 हजार ऋषियों ने वैदिक ज्ञान को लिपिबद्ध कर हमारे सामने एक विरासत रखी है। उस काल खण्ड में जब साधन नहीं थे, तब नैमिषारण्य में 88 हजार ऋषि-मुनि गये और उन्होंने मंथन करते हुए भारत को वेदों की परम्परा का अमर ज्ञान दिया। वैदिक ज्ञान का यह भण्डार मानवता को नयी राह दिखा सकता है। इस चराचर जगत के अनेक रहस्यों का उद्घाटन होना अभी बाकी है। इन रहस्यों की खोज के लिए एक नयी राह हमारा वैदिक ज्ञान दिखा सकता है। यह हमारे पास एक धरोहर के रूप में है। इस धरोहर को आगे बढ़ाने के लिए हमें तैयार होना होगा। यह प्रयास हर स्तर पर प्रारम्भ होना चाहिए। अपने संस्थानों में इसे प्राथमिकता देनी चाहिए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान, लखनऊ विश्वविद्यालय तथा उत्तर प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग ने इस तीन दिवसीय समागम का आयोजन लखनऊ में किया है। सदियों पूर्व, यहां से लगभग 70 किलोमीटर दूर स्थित नैमिषारण्य में 88 हजार ऋषियों ने मंथन के माध्यम से भारत की वैदिक परम्परा को लिपिबद्ध करने का कार्य किया था। यहीं से ‘आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वत’ के स्वर फूटे थे। आज का यह समागम भारत की उस प्राचीन परम्परा का स्मरण हमें कराता है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि विद्या भारती देश व दुनिया में भारत और भारतीयता की उत्तम शिक्षा का केन्द्र है। आज देश में अनुकूल वातावरण है। सरस्वती शिशु मन्दिर और विद्या भारती के संस्थानों ने सरस्वती वन्दना और राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम को जीवित बनाए रखा है। आज इनका राष्ट्रव्यापी स्वरूप देखने को मिलता है। हर संस्थान इनके आयोजनांे से जुड़ता है। राष्ट्रीय गीत विधान सभा तथा संसद की कार्यवाही का हिस्सा बना है। विद्या भारती ने अन्य अनेक क्षेत्रों में कार्य किया है। एकल विद्यालय के माध्यम से वनवासी, गिरिवासी तथा दुर्गम क्षेत्रों में इसने अपने कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि आज का यह समागम उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नये मंथन की शुरुआत करेगा। यह नये भारत को, विकसित भारत के प्रधानमंत्री जी के संकल्पों को पूरा करने की ओर अग्रसर करने में सहायक होगा। यह समागम उच्च शिक्षण संस्थानों को नई दिशा देगा। मुख्यमंत्री जी ने देश के अलग-अलग संस्थानों से आये शिक्षाविदांे से प्रदेश की राजधानी लखनऊ का भ्रमण करने के साथ ही, नैमिषारण्य और अयोध्या का दर्शन करने की बात कही।

इस अवसर पर भारत सरकार के शिक्षा राज्य मंत्री डाॅ0 राज कुमार रंजन सिंह, प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री योगेन्द्र उपाध्याय, मत्स्य मंत्री संजय निषाद, जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह, उच्च शिक्षा राज्य मंत्री रजनी तिवारी, विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो0 कैलाश चन्द्र शर्मा, लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 आलोक कुमार राय सहित देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति तथा शिक्षकगण उपस्थित थे।

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