फाइलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम के अंतर्गत बीमारी के रोकथाम एवं नियंत्रण के संबंध में प्रस्तुतीकरण

महापौर संयुक्ता भाटिया की अध्यक्षता एवं नगर आयुक्त अजय कुमार द्विवेदी की उपस्थिति में नगर निगम मुख्यालय में आयोजित एक बैठक में क्षेत्रीय पार्षदगण को फाइलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम के अंतर्गत बीमारी के रोकथाम एवं नियंत्रण के संबंध में प्रस्तुतीकरण किया गया। इस प्रस्तुतीकरण के दौरान अतिरिक्त मुख्य चिकित्सा अधिकारी ए.के. त्रिपाठी, अपर नगर आयुक्त अभय कुमार पाण्डेय, नगर स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. एस.के. रावत, परिवार एवं स्वास्थ्य कल्याण विभाग से डा. धर्मेन्द्र त्रिपाठी, सी.एच.आर.आई. से शुभम मिश्रा व अन्य उपस्थित रहे।

नगर स्वास्थ्य अधिकारी एस.के. रावत द्वारा अवगत कराया गया कि फाइलेरिया के कारण हाथ व पाँव फूलने, हाईड्रोसील जैसी समस्या हो जाती है तथा कुछ प्रकरण में दूधिया पेशाब होता है जिसका कोई उपचार नहीं है। यह बीमारी जीवन में एक बार हो जाने पर लक्षण वापस नहीं होते। ऐसी स्थिति में रोगी का जीवन अत्यंत दुष्कर हो जाता है।

डॉ. त्रिपाठी द्वारा प्रस्तुतीकरण के माध्यम से अवगत कराया गया कि दिनांक 22 नवम्बर से 07 दिसम्बर, 2021 तक फाइलेरिया मुक्ति अभियान चलाया जा रहा है जिसमें लखनऊ जनपद में 3800 टीम लगायी गयी है जिनको एक दिन में 25 घरो को दवा अपने सामने ही खिलायी जा रही है। बैठक में महापौर को डा. त्रिपाठी द्वारा फाइलेरिया की दवा खिलायी गयी।

प्रस्तुतीकरण द्वारा अवगत कराया गया कि विश्व के कुल मरीजो का 40 प्रतिशत मरीज भारत में है तथा भारत के 21 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के 272 जिले फाईलेरिया के लिए एंडेमिक माने गए है। इसमें उत्तर प्रदेश में भी सम्मिलित है। भारत में लगभग 60 करोड़ से ज्यादा व्यक्तियों पर फाईलेरिया का खतरा है।

फाइलेरिया के संबंध में बताया गया कि लिम्फैटिक फाइलेरिया या फाइलेरिया एक परजीवी जनित रोग है। भारत में यह रोग मुख्यतः दो परजीवियों के कारण होता है : वुचरेरीआ बेनक्रोफ़टाई और ब्रुजिया मलाई। ये परजीवी मच्छरों द्वारा मनुष्य के शरीर में पहुंचते हैं। इस प्रकार यह रोग मच्छर के काटने से फैलता है। भारत में क्यूलेक्स क्विनकीफासिएटस और मानसोनिआ प्रजाति के मच्छर इस रोग के परजीवियों के मुख्य वाहक हैं। यह एक घरेलु मच्छर है जो कि आमतौर से गंदे पानी में मनुष्यों की आबादी का आसपास पनपता है किन्तु गन्दा पानी न मिलने पर साफ पानी में भी पनप सकता है। अंडे से लेकर वयस्क होने तक इसका जीवन चक्र 10-14 दिन का होता है। अतएवं आसपास के क्षेत्र में कहीं भी पानी का ठहराव न हो तथा मच्छरो को पनपने न दिया जाय।

बताया गया कि फाइलेरिया जानलेवा रोग तो नहीं है परन्तु यह मरीजों की ज़िन्दगी को बहुत ही पीड़ादायक बना देता है।

फाइलेरिया की रोकथाम के लिए सामूहिक रूप से दवा सेवन अभियान चलाकर कराया जा रहा है। जिसमें एंटी-फाइलेरियाल ड्रग यानि डी.ई.सी. और अल्बेंडाजोल की वर्ष में 1 खुराक स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा अपने सामने ही खिलायी जाती है। 2 साल से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और गंभीर रोग से पीड़ित व्यक्तियों को यह दवा नहीं खिलायी जायेगी। किसी परेशानी/साइड इफ़ेक्ट की अवस्था में चयनित रैपिड रिस्पांस टीम या नज़दीकी स्वास्थय केंद्र से संपर्क किया जा सकता है। बताया गया कि साल में यदि डी.ई.सी. एवं अल्बेंडाजोल की एक खुराख लगातार 5-7 साल तक खायी जाए तो इस बीमारी से छुटकारा मिल सकता है। यह दवाएं पूर्णतः सुरक्षित है एवं दवाओं का कोई विशेष साइड इफेक्ट नहीं है।

बैठक में महापौर द्वारा कहा गया कि फाइलेरिया उन्मूलन में सभी का सहयोग आवश्यक है जिसमें नगर निगम लखनऊ द्वारा स्वास्थ्य विभाग को पूर्ण सहयोग प्रदान किया जायेगा। इसके लिए क्षेत्रीय पार्षदगण स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के साथ क्षेत्र में भी जायेगे तथा प्रचार-प्रसार का कार्य करने में अपने क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा सहयोग भी प्रदान करेगे।

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